माया माहाठगिनि “माया माहाठगिनि” डॉ. गदाधर सिंह के भोजपुरी ललित निबंध संग्रह हटे, जवना के द्वितीय संस्करण के प्रकाशन सन् 2013 में निलय प्रकाशन, वीर कुँअर सिंह विश्वविद्यालय परिसर, आरा, भोजपुर (बिहार) से भइल बा. एकर कीमत 100 रुपया बाटे आ एह्में 120 गो पन्ना बा. एह ललित निबंध संग्रहपूरा पढ़ीं…

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(ललित-व्यंग) – डा0 अशोक द्विवेदी आदमी आखिर आदमी हs — अपना मूल सोभाव आ प्रवृत्तियन से जुड़ल-बन्हाइल। मोह-ममता के लस्का आ कुछ कुछ आदत से लचार। ओकर परम ललसा ई हवे कि ऊ तरक्की करो आ सुख से रहो ! ई सुखवो गजब क चीझु ह s। एकरा खातिर लोगपूरा पढ़ीं…

– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल   शास्त्रन में तीज के हरितालिका नाम से जानल जाला. “हरितालिका” शब्दो एह ब्रत खातिर खूब प्रचलित बा. भादो का अँजोर में तृतीया तिथि1 के एकर अनुष्ठान कइल जाला. पति खातिर ‘तीज’ आ बेटा खातिर ‘जिउतिया’ से बड़ ब्रत ना मानेलिन मेहरारू लोग. ई मान्यता बापूरा पढ़ीं…

– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल भादो महीना के अन्हरिया के चौथ के बहुरा कहल जाला.कहीं-कहीं एकरा के गाइ माई के पूजा के परब मानल जाला.गाइ आपन दूध पियाके आदिमी के पालेले आ पोसेले,हमनियो के कृतज्ञ होके गाइ के  सम्मान करेके चाहीं, पूजेके चाहीं.ओइसे, हम एकरा के सत्य आउर धर्म कापूरा पढ़ीं…

– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल चाहे शहर होखे भा गाँव आ गाँव में त अउरी, सावन के महीना आवते शुरू हो जाला लइकन के कबड्डी, खो-खो, चीका आ फनात के मजदार खेल. शहर-ओहर में त लइकियो ईहे गेमवा खेलेली सन बाकिर गाँव अबहिंयो एगो परंपरा का साथे आनंद लेत लउकेला. गाँव मेंपूरा पढ़ीं…

भोजपुरी के सुप्रसिद्ध गायक भरत शर्मा “व्यास” खातिर पद्मश्री अलंकरण के हम शुरुएसे आग्रही हईं। श्री शर्मा के व्यापक पैमाना पर ख्याति मिलेके आरंभिक वर्ष हटे 1989 के आरंभ। आर सीरीज, मऊ का बाद टी सीरीज के सङही रामा आ मैक्सो के कैसेट बाजार में धूम मचावे लगलन स। तबपूरा पढ़ीं…

– डा. अशोक द्विवेदी गँवई लोक में पलल-बढ़ल मनई, अगर तनिको संवेदनशील होई आ हृदय-संबाद के मरम बूझे वाला होई, त अपना लोक के स्वर का नेह-नाता आ हिरऊ -भाव के समझ लेई. आज काकी का मुँहें एगो जानल-सुनल पुरान गीत सुनत खा हम एगो दोसरे लोक में पहुँच गउंवीं.पूरा पढ़ीं…

– देवकान्त पाण्डेय उत्‍तर प्रदेश के मऊ जिला के मुहम्‍मदाबाद गोहना तहसील में मऊ शहर से करीब 28 कि.मी. दूर आजमगढ़-मुहम्‍मदाबाद गोहना-घोसी रोड पर स्थित देवलास मऊ जिला के प्रमुख पर्यटक स्‍थलन में गिनल जाला. देवल ऋषि के तपोस्थली के रूप में प्रसिद्ध ए स्‍थान के आपन कुछ विशेषता बापूरा पढ़ीं…

– अशोक द्विवेदी फागुन बाट ना जोहे, बेरा प’ खुद हाजिर हो जाला. रउवा रुचेभा ना रुचे, ऊ गुदरवला से बाज ना आवे. एही से फगुवा अनंग आ रंग के त्यौहार कहाला. राग-रंग के ई उत्सव, बसन्त से सम्मत (संवत् भा होलिका दहन) आ होली से बुढ़वा मंगर ले चलेला.पूरा पढ़ीं…

– भगवती प्रसाद द्विवेदी भोजपुरी में लोकगायकी के एगो लमहर, निठाह आ बड़ा सुघर परम्परा रहल बा. खाली पचीस-तीस करोड़ भोजपुरी बोले वाला लोगने में ना, बलुक देश-विदेश के अउर दीगर भाषा बोलनिहारनों के बीच में भोजपुरी गीत गवनई के धूम शुरूए से मचत रहल बा. अब त एकर शोहरतपूरा पढ़ीं…

– डा. प्रमोद कुमार तिवारी लोक के नाँव लेहला पऽ मन में ओकर दू गो छवि बनेला. एगो छवि में कलकल नदी बहेले, फल से गदराइल पेड़ लउकेला, गीत आ उत्सव से भरल खुशहाल लोग नजर आवेले आ हरियाली भरल खेत के बीच से कच्चा पगडंडी पऽ पोंछ उठा केपूरा पढ़ीं…