Category: निबन्ध

केसर के गंध लेके पुरवा चलल रहे

(स्मरण – आचार्य गणेशदत्त ‘किरण’) (पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 8वी प्रस्तुति) – प्रभाष कुमार चतुर्वेदी (आखिरी पाँच बरिस) कविता केसर का गंध जइसन मादक आ…

जो दिल खोजा आपना…….

– प्रभाकर पाण्डेय “गोपालपुरिया” आजु जी बहुत उदास बा. ए उदासी के कारन हम खुदे बानी. हमरा ई लागत रहल ह की भारत में जवन भ्रस्टाचार व्याप्त बा, अंधकार व्याप्त बा,…

वसंत कहीं नइखे भुलाइल

– पाण्डेय हरिराम जाड़ा आहिस्ता से मौसम के गाल चूमलसि त मौसम का रग में गर्मी दउड़ि गइल…. लोग कहल वसंत आ गइल. फगुआ आ गइल. आ आजु साँचहू के…

भिखारी ठाकुर

– संतोष कुमार पटेल भिखारी ठाकुर भोजपुरी माई के एगो लाल मनई में कमाल अइसन पूत के पाके धरती हो गइली निहाल. काहे कि अइसन लोग धरती पर बेर बेर…

नीमिया रे करूवाइन

– डा॰ जनार्दन राय नीनि आइल निमन ह. जेकरा आँखि से इहां का हटि जाइला ओकर खाइल-पियल, उठल-बइठल, चलल-फिरल, मउज-मस्ती, हंसी-मजाक कुल्हि बिला जाला. अइसन जनाला कि किछु हेरा गइल…

अउर ए बंद से महँगाई घटि गइल…हा..हा..हा..हा..

– प्रभाकर पाण्डेय “गोपालपुरिया” केतना खुशी के बाति बा कि काल्ह का बंद से महँगाई घटि गइल. हँ भाई! काँहें हँसतानि? घटल नइखे का? खैर हो सकेला रउरा खातिर ना…

काहे लिहनी धरती पर अवतार

– प्रभाकर पाण्डेय “गोपालपुरिया” छोट रहनी तS कई बेर केहू-केहू कहि देत रहल कि ए बाबू अवतारी हउअS का? एकदिन रहाइल ना अउरी हम पूरा गाँव-गिराँव, हित-नात सबके बोलवनि अउरी…

फ्यूचर बहुत ब्राइट बा, चाचा!!

– दिवाकर मणि रामलुभाया चाचा, गोड़ लागिले. खुश रहऽ ए गुणगोबर. कहऽ का हाल-चाल बा? आजुकाल्हि त ना देखाई देत बाड़ऽ ना तहरे बारे में कुछु सुनाते बा, अईसन काहे…